भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 227 तब लागू होती है जब कोई व्यक्ति, जो कानूनी रूप से सत्य बोलने के लिए बाध्य है, जानबूझकर झूठा बयान देता है या ऐसा बयान देता है जिसमें उसे विश्वास नहीं होता।
यह धारा सुनिश्चित करती है कि न्यायिक प्रक्रिया में केवल सत्य ही प्रस्तुत किया जाए।
व्याख्या:
कोई भी बयान मौखिक, लिखित, या किसी भी अन्य रूप में दिया गया हो, वह झूठी गवाही के अंतर्गत आ सकता है।
यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी बात को सच मानने का झूठा दावा करता है, तो उसे भी झूठी गवाही देने का दोषी माना जाएगा।
सजा:
जो कोई शपथ के तहत झूठा बयान देता है, उसे कैद और जुर्माने से दंडित किया जाएगा, जैसा कि झूठी गवाही और न्याय में बाधा डालने से संबंधित अन्य कानूनी प्रावधानों में उल्लेख है।
यह कैसे सुरक्षा प्रदान करती है:
यह धारा न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए झूठी गवाही और गलत बयानों को रोकती है।
यह निर्दोष लोगों को गलत सजा से बचाने और न्यायिक प्रक्रिया को निष्पक्ष और सत्य पर आधारित बनाने में मदद करती है।
उदाहरण:
यदि कोई गवाह किसी अपराध के मुकदमे में जानबूझकर झूठ बोलता है कि उसने आरोपी को अपराध स्थल पर देखा था, तो वह इस धारा के तहत दोषी होगा।
इसी तरह, यदि कोई विशेषज्ञ गवाह किसी नकली दस्तावेज को सही ठहराने के लिए झूठा बयान देता है, तो उसे भी सजा दी जाएगी।