भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 24 यह प्रावधान करती है कि यदि कोई व्यक्ति नशे की अवस्था में कोई अपराध करता है, तो उसे ऐसा माना जाएगा कि उसने वह अपराध पूरे होश में किया था, जब तक कि उसे जबरन या उसकी जानकारी के बिना नशा नहीं कराया गया हो।
मुख्य प्रावधान:
नशे की स्थिति में अपराध करने पर जिम्मेदारी बनी रहेगी
यदि किसी अपराध के लिए विशेष ज्ञान या इरादे (intent) की आवश्यकता हो, तो नशे में होने को बचाव के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
कानून यह मानकर चलेगा कि व्यक्ति के पास वही समझ और इरादा था जो वह होश में होने पर रखता।
यदि नशा जबरन कराया गया हो, तो अपवाद लागू होगा
यदि किसी को बिना उनकी जानकारी या उनकी मर्जी के खिलाफ नशा कराया गया हो, और वे अपने कार्यों को समझने में असमर्थ थे, तो उन्हें अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जाएगा।
केवल जबरन नशा कराए जाने की स्थिति में ही यह बचाव उपलब्ध है।
सबूत की जिम्मेदारी (Burden of Proof)
आरोपी को यह साबित करना होगा कि उसे उसकी मर्जी के खिलाफ या बिना जानकारी के नशा कराया गया था।
अन्यथा, उसकी ज़िम्मेदारी ऐसे ही मानी जाएगी जैसे वह नशे में नहीं था।
यह कैसे सुरक्षा प्रदान करती है?
अपराधियों को नशे को बहाने के रूप में इस्तेमाल करने से रोकती है।
स्वेच्छा से नशा करने वालों को पूरी तरह से उत्तरदायी बनाती है।
उन लोगों को कानूनी सुरक्षा देती है जो अनजाने में नशे में डाल दिए गए थे।
उदाहरण:
यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से शराब पीकर झगड़ा करता है और हमला करता है → उसे अपराध के लिए पूरी तरह जिम्मेदार ठहराया जाएगा।
यदि किसी व्यक्ति को अनजाने में नशीला पदार्थ दिया जाता है और वह अपराध करता है → वह तब तक जिम्मेदार नहीं होगा जब तक यह साबित न हो कि वह अपने कार्यों को समझने में असमर्थ था।