भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 19 यह प्रावधान करती है कि यदि कोई व्यक्ति किसी कार्य को यह जानते हुए करता है कि उससे नुकसान हो सकता है, लेकिन वह कार्य आपराधिक इरादे के बिना और सद्भावना से किसी बड़े नुकसान को रोकने के लिए किया गया हो, तो वह अपराध नहीं माना जाएगा।
मुख्य प्रावधान:
यदि कार्य जानबूझकर किया गया है लेकिन किसी बड़े नुकसान को रोकने के लिए किया गया है, तो यह अपराध नहीं होगा
यदि कोई व्यक्ति यह जानता है कि उसका कार्य नुकसान पहुँचा सकता है, लेकिन उसका उद्देश्य किसी अधिक गंभीर खतरे को रोकना है, तो उसे अपराधी नहीं माना जाएगा।
कार्य की वैधता परिस्थितियों पर निर्भर करेगी
न्यायालय यह तय करेगा कि जिस नुकसान को रोकने के लिए कार्य किया गया था, वह इतना गंभीर और तात्कालिक था कि जोखिम लेना जरूरी हो गया था।
उदाहरण:
उदाहरण 1: जहाज टकराने से बचाने का प्रयास
A एक जहाज का कप्तान है और देखता है कि यदि वह कोर्स नहीं बदलता, तो उसकी जहाज नाव B से टकरा जाएगी जिसमें 30 लोग सवार हैं।
यदि वह कोर्स बदलकर नाव C की ओर चला जाता है जिसमें केवल 2 लोग सवार हैं, तो यदि यह साबित हो कि उसने अधिक जान बचाने के लिए ऐसा किया था, तो वह अपराधी नहीं होगा।
उदाहरण 2: आग रोकने के लिए घर तोड़ना
A एक बड़े आग फैलने से रोकने के लिए कुछ घरों को तोड़ देता है।
यदि यह सिद्ध हो कि आग फैलने से और अधिक जान-माल का नुकसान हो सकता था, तो A को अपराधी नहीं माना जाएगा।
यह कैसे सुरक्षा प्रदान करती है?
बड़े नुकसान को रोकने के लिए उठाए गए आवश्यक कदमों को वैधता प्रदान करती है।
यह सुनिश्चित करती है कि सद्भावना से कार्य करने वाले निर्दोष लोगों को अपराधी न बनाया जाए।
केवल दुर्भावनापूर्ण या लापरवाही से किए गए कार्यों को ही अपराध माना जाए।
अन्य उदाहरण:
यदि कोई डॉक्टर मरीज की जान बचाने के लिए उसकी टांग काट देता है, तो यह अपराध नहीं होगा यदि यह कार्य सद्भावना से किया गया हो।
यदि कोई चालक एक व्यक्ति को बचाने के लिए तेजी से मुड़ता है और गलती से एक खड़ी कार को टक्कर मार देता है, तो यह अपराध नहीं होगा यदि यह जानबूझकर नुकसान पहुंचाने के इरादे से नहीं किया गया था।