भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 15 यह प्रावधान करती है कि यदि कोई न्यायाधीश अपने कानूनी अधिकारों का उपयोग करते हुए न्यायिक कर्तव्यों का पालन कर रहा है, तो उसे आपराधिक रूप से उत्तरदायी नहीं ठहराया जाएगा, भले ही वह निर्णय त्रुटिपूर्ण हो।
मुख्य प्रावधान:
न्यायाधीश को न्यायिक कार्यों के लिए आपराधिक सुरक्षा
यदि कोई न्यायाधीश अपने न्यायिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए कोई निर्णय लेता है, तो उसे आपराधिक रूप से दोषी नहीं ठहराया जाएगा।
यह संरक्षण तब भी लागू होगा यदि न्यायाधीश से गलती हो जाए, जब तक कि वह कार्य सद्भावना (Good Faith) में किया गया हो।
सद्भावनापूर्ण त्रुटियों के लिए कोई आपराधिक उत्तरदायित्व नहीं
यदि कोई न्यायाधीश गलती से यह मानता है कि उसे किसी कार्य को करने का कानूनी अधिकार है, और उसने वह कार्य सद्भावना से किया, तो वह अपराध नहीं माना जाएगा।
यह कैसे सुरक्षा प्रदान करती है?
न्यायिक स्वतंत्रता (Judicial Independence) सुनिश्चित करती है, जिससे न्यायाधीश बिना किसी दबाव के अपने कर्तव्यों का पालन कर सकें।
न्यायाधीशों के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण कानूनी मामलों को रोकती है, जो उनके निर्णय लेने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं।
गलत निर्णयों के लिए न्यायिक समीक्षा (Appeal) और उच्च न्यायालयों द्वारा निगरानी का विकल्प खुला रखती है।
उदाहरण:
यदि कोई न्यायाधीश गिरफ्तारी वारंट जारी करता है, यह मानते हुए कि उसे ऐसा करने का अधिकार है, लेकिन बाद में पता चलता है कि उसे यह अधिकार नहीं था, तो यह अपराध नहीं माना जाएगा यदि निर्णय सद्भावना से लिया गया था।
यदि कोई न्यायाधीश किसी व्यक्ति को सजा देता है, लेकिन उच्च न्यायालय में वह सजा रद्द कर दी जाती है, तो न्यायाधीश आपराधिक रूप से उत्तरदायी नहीं होगा।